मधेशी जनता बंद करेगी ओली की बोली, गिर सकती है सरकार

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राम के देश का सीता की धरती से विवाद हुआ है। बहेलियों ने घर में फूट डालने की कोशिश की है और युगों पुरानी रिश्ते की मजबूत दीवार दरकने लगी है । विश्व टकटकी लगाए देख रहा है गाँव के उस भीड़ की तरह जो घर का झगड़ा देखने दरवाजे पर भीड़ लगा देती है । उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रिश्ता टूटेगा या बचेगा लेकिन टीका टिप्पणी हर तरफ शुरू हो चुकी है । देश में राजनीति ने भी पासे फेंके है तो पड़ोसियों का भी किरदार अहम और स्पष्ट दिखाई दे रहा है । बात भगवान राम के भारतवर्ष और माता जानकी के देश नेपाल की है । पिछले कुछ  वर्षों में खासकर सत्ता परिवर्तन के बाद जब से केपी शर्मा ओली नेपाल देश के प्रधानमंत्री बने है, नेपाल के तेवर बदल गए है । जाहीर सी बात है, इसमें मंथरा बनी चीन का अहम योगदान भी है।

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आज बात करते है नेपाल भारत के व्यावहारिक सम्बन्धों की, रिश्तों में आ रहें तनाव की और मैका और ससुराल के आगे बन सकने वाले हालात की । दरअसल नेपाल की संसद में एक बिल पेश किया गया है । संविधान संसोधन इस बिल में विदेशी महिलाओं को दी जानेवाली नागरिकता के नियमों में बदलाव किया गया है। भारत के साथ बेटी रोटी के संबंध और सदियों से चले आ रहें रिश्तेदारी को अब वहाँ के प्रधानमंत्री ओली कागजों और कायदों के डोर में बांधना चाहते है, लेकिन यही डोर अब उनके लिए गले का फंदा बन गया है । ओली की बोली बंद करने के लिए वहाँ के मधेशी नेपालियों ने बगावत के बिगुल फूँक दिये हैं । नतीजा ये कि अब ओली के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खतरा मंडराने लगा है ।

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कौन हैं मधेशी नेपाली –

हिमालय से सटे तराई क्षेत्र को मध्यदेश कहा जाता था तो बाद में बोल चाल में मधेश कहा जाने लगा । भारत और नेपाल के बीच युगों युगों के सभ्यता जुड़ाव ने कभी भी ऐसा महसूस नहीं होने दिया के दो अलग राष्ट्र होते हुए भी दो है । व्यापार करने और बेटी रोटी के संबंध को निभाने में कई भारतीय और नेपाली एक दूसरे के देश में आते जाते रहे हैं । जिस कारण मधेश क्षेत्र में उत्तरप्रदेश और बिहार का एक बहुसंख्यक वर्ग बस गया । समय के साथ उनकी पीढ़ियों ने नेपाली संस्कृति को रगो में उतार लिया लेकिन भाषा और भाव में भारतीयता बरकरार रह गई । रंगरूप भी भारतियों का अलग सा रहा । जिस कारण उन्हे बरसो क्षेत्रवाद से पनपी उपेक्षाओं का सामना भी पड़ा। उन्ही मध्यदेश में बसे प्रवासी भारतियों को मधेशी कहा गया । संख्या और संपन्नता के आधार पर नेपाल में मधेशी काफी आगे है लेकिन सत्ता और ताकत ने फिर भी उन्हे कभी अपने बराबर खड़ा नही होने दिया ।

आज लगभग 1.5 करोड़ मधेशी बसते हैं नेपाल में, और तराई क्षेत्र में इनकी संख्या सबसे ज्यादा है लेकिन चूंकि नेपाल में सांसद संख्या पर नहीं बल्कि क्षेत्रफल विस्तार के आधार पर चुने जाते है । इसलिए वहाँ संसद में मधेशियों का बहुमत नहीं है । नेपाल की संसद में कुल 275 सांसद है जिसमे से 33 मधेशी निर्वाचित है । प्रशानिक और संवैधानिक रूप से देखे तो यह संख्या काफी कम है, शायद यही वजह है कि संसद में लाया जाने वाला संविधान संसोधन बिल चिंता का सबब बना हुआ है ।

जमीन पर भी दावा ठोकता नेपाल

उधर चीन के बहकावे में आकार नेपाल के कम्यूनिस्ट विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले प्रधानमंत्री और उनकी संसद ने नेपाल के नक्शे में भी कुछ बड़े बदलाव किए है, जिसमें भारत के कई भूखंडो पर दावा ठोका गया है । नेपाल के स्थानीय मधेशी सांसद बताते है कि यह चीन की चाल है और वह लिपुलेख और कालापानी जैसे भूखंड के जरिये भारत में बड़ी आसानी से प्रवेश कर सकता है, जिसपर वह नेपाल का और अप्रत्यक्ष रूप से अपना अधिपत्य चाहता है । चीन की विस्तारवाद नीतियों ने पहले से भी नेपाल के कई गांवों पर अपना कब्जा जमाया हुआ है लेकीन उस तरफ प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का कोई ध्यान ना देना साफ यही बताता है कि नेपाल की सत्ताशीर्ष पर चीन का दबदबा कायम हो चुका है । समाधान एक ही है, कि नेपाल में सत्ता पलट किया जाये, जिसके स्वर अब गूंजने भी लगे है ।

भारत हमेशा से नेपाल का हितैसी रहा है और नेपाल भूकंप और अन्य किसी भी आपदा के समय में भी भारत ने आगे बढ़कर नेपाल की मदद की थी । मधेशियों ने नेपाल की अर्थव्यवस्था को सदियों अपने कंधो पर ढोया है । अब नेपाल सरकार इस बेटी रोटी के संबंध को सत्ता के नोक से खत्म करने की कोशिश कर रही है तो नेपाल के बहुसंख्यक मधेशी विरोध के लिए सामने आ रहे है। नेपाल के 22 जिलों में बसे हुए 1.5 करोड़ मधेशियों ने विरोध कर दिया अगर, तो गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन सकती है । जिसके दमन के लिए बेशक ओली चीन कि तरफ देखेंगे, और वही भारत को अपनी प्रत्यक्ष कूटनीति का प्रभाव दिखाना पड़ेगा । अभी फिलहाल पर्दे के पीछे बहुत कुछ हो रहा है और चीन गद्दारी के पैमानों पर अपने पूर्वजो के खून को प्रमाणित करते हुए फिर से शत प्रतिशत खड़ा उतरा है । लेकिन याद रहे…. “ये आज का हिंदुस्तान है” । 

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