विकास दुबे एनकाउंटर पर अगर फिल्म बनी तो ये होगी कहानी

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“मैं हूँ विकास दुबे, कानपुर वाला”… अपना परिचय कहिए या विकास दुबे एनकाउंटर से बचने की आखिरी उम्मीद तलाशते दुर्दांत अपराधी का आखिरी दाव, जो है अब बस यही है उसकी आखिरी निशानी के तौर पर मीडिया और सोशल मीडिया में । जी हां, हम बात कर रहें हैं उत्तरप्रदेश के कानपुर पुलिस मुठभेड़ से मुख्य मीडिया में रातोरात दहशत का पर्याय बन चुके विकास दुबे की । उसके खून से रंगे हाथों का इतिहास कानपुर उत्तरप्रदेश और उसके आस पास के इलाकों में अपराध की जड़े सींचता रहा है, सालों तक । आज उसी अपराधी की पटकथा बताते हैं ।

 

विकास दुबे के बचपन की फाइल का ज्यादा कहीं उल्लेख नहीं है लेकिन जवानी का दबदबा हर विभाग में रहा है । अपराध जगत में उत्पात मचा रहें है इस कुख्यात का नाम सबसे पहले पुलिस के दस्तावेजों में साल 1990 में यानि आज से तीस साल पहले आया जब बिकरू गाँव के विकास दुबे ने नवादा के किसानों को अपना निशाना बनाया । जम कर मारपीट हुई और पहली बार विकास दुबे एक खौफ के रूप में उभरा । विकास दुबे ब्राह्मण जाति से आने वाला एक कुख्यात अपराधी बन चुका था और उसका इस्तेमाल तब पिछड़ों के इलाके में ब्राह्मण वर्चस्व बनाने में भी किया जाता था । जिसकी वजह से तब के तात्कालिक सियासी सूरमाओं ने उसे राजनैतिक संरक्षण भी दिया। हाथ में हथियार और पीठ पर मिलने वाले राजनैतिक सह ने विकास दुबे को अपराध का मसीहा बनाना शुरू कर दिया ।

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बताया जाता है उत्तरप्रदेश के चौबेपुर थाना में विकास दुबे के खिलाफ 60 आपराधिक मुकदमे और FIR दर्ज हैं । गुनाहों के बिसात पर यह मोहरा अब शतरंज के उस खांचे की तरफ बढ़ रहा था जहां से वह एक नए रूप में ताकतवर विकास दुबे को जन्म दे सके । साल 2000 में विकास ने कानपुर के शिवली में इंटर कॉलेज के सहायक प्रबन्धक सिद्धेश्वर पाण्डेय की गोली मार कार हत्या कर दी । अब तक मारपीट करने वाले विकास दुबे का यह पहला मर्डर रेकॉर्ड था । इस हत्या ने मानो वहसी शेर के दाँत में खून लगा दिये। जिंदगियाँ लेना मानो उसका चस्का बन गया और फिर उसने कभी ईसपे लगाम लगाने की कोशिश भी नही की, और न की किसी को उसे रोकने की हिम्मत हुई ।

हिम्मत और खौफ और आतंक की बात करे तो वो इस घटना से प्रमाणित होती है कि साल 2001 में BJP के राज्यमंत्री संतोष शुक्ला को विकास ने थाने में घुसकर मारा और किसी के मुंह से चू तक नहीं निकला । तमाम पुलिस वालो के सामने ये एक सत्ता के ताकतवर व्यक्ति कि हत्या हुई और किसी भी पुलिस वाले ने उसके खिलाफ गवाही नहीं दिया। सबूत और गवाह के अभाव में विकास छुट गया और फिर उसी दुनिया में अपने नाम का सिक्का चलाने लगा । बीच बीच में वह जेल में भी रहा । लेकिन उसका आपराधिक जाल इतना मजबूत हो चुका था कि वो कही से भी कोई भी घटना को अंजाम दे सकता था । इस बात की पुष्टि तब हुई जब जेल में रहते हुए ही उसने राम बाबू यादव पर हमला करवा दिया । प्रशासन भौचक्का रह गया और अब विकास दुबे को जेल में रखने या बाहर रखने में ज्यादा फर्क नही रहा । हवा में फैले जहर कि तरह उसके इरादे कहीं भी पहुँच जाते थे, काम को अंजाम देते थे और निकल जाते थे । पुलिस को हमेशा अपराध के बाद की ही तस्वीरे मिलती थी ।

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अब हत्या, लड़ाई झगड़े ये सब कोई नई बात नहीं थी विकास दुबे के नाम के आगे जोड़ने के लिए । साल 2004 में केबल व्यवसायी की हत्या, 2013 में भी हत्या की बड़ी वारदात और 2018 में चचेरे भाई अनुराग पर हमला करवाया, FIR हुई और दर्ज मुकदमों की संख्या एक बढ़ गई, उससे उससे ज्यादा अब अपराध कुछ और ना था । यूं समझिए कि अपराध करने के बाद रजिस्टर मेंटेन कर दिया जाता था । बड़ा सवाल ये है कि ये सब वो इतनी आसानी से करता कैसे था ? तो इसका जवाब भी हम आपको समझा देते है । विकास दुबे पुलिस प्रशासन के क्राइम रिकॉर्ड में अब हिस्ट्री सीटर था । शुरुआती दौर में अगड़े पिछड़े की राजनीति ने उसे मजबूत बना दिया, और उसके बाद विकास ने आगे का रास्ता खुद चुना । उसे ताकत से प्यार था, वो जिससे मिल जाये वो उसका हमदर्द बन जाता था ।

2002 में विकास दुबे की एंट्री राजनीति में हुई । मायावती से उसके रिश्ते अच्छे हुए और अब तक क्षेत्रीय नेताओं के सह पर शेर बना विकास दुबे राज्य की सत्ता के सह पर माफिया बनने के रास्ते पर निकल पड़ा । जेल में बंद होने के बाद भी वो चुनाव लड़ा उत्तरप्रदेश के शिवराजपुर नगर पंचायत से, और विजयी हुआ । जेल से उसने हत्याए भी कारवाई । बसपा के करीबी होने का उसे पूरा लाभ मिला और उसने व्यापारिक तौर पर भी अपने खूब पाँव पसारे । कई कॉलेज, स्कूल और संस्थान आज भी विकास दुबे के नाम है जिसकी करोड़ो कि कमाई का एकलौता मालिक विकास दुबे था । ऐसा नही है कि सिर्फ बसपा में ही उसने पैठ जमाई, बल्कि सपा और भाजपा के भी कई नेताओ से उसके अच्छे रिश्ते रहें । समाजवादियों की सरकार ने भी उसे कानूनी सरंक्षण दिया और भाजपा के भी कई बड़े नेताओं के साथ उसकी तस्वीरें सामने आई । मिलाजुला कर देखे तो कानून का गिरेबान पकड़े रहने के लिए विकास दुबे ने सियासत से हाथ मिलाये रखा, चाहे सरकार किसी कि भी हो ।

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लेकिन अपराध का भी एक अंत होता है । दिया बुझने से पहले फकफकाता है । बुरे कर्म एक बार बिजली तरह चमकते हैं, गरजते हैं, खौफ पैदा करते है और फिर एक सन्नाटे में विलीन हो जाते है । वही हुआ साल जुलाई 2020 के उस माह में जब बिकरू गाँव में रात के अंधेरे में विकास दुबे को गिरफ्तार करने पहुंची पुलिस पर विकास दुबे ने अपना दमखम दिखाया । पुलिस के जवानों को अपने आँगन के बाहर घेर कर विकास दुबे ने उन्हें गोलियों से छलनी करवा दिया । विकास दुबे एनकाउंटर  में 8 जवान शहीद हो गए । विकास दुबे फरार हो गया । लेकिन अब उत्तरप्रदेश में राजनीति ने इस ताकत को कुचलने का फैसला किया । सत्ता ने खुद से भी मजबूत होते इस अपराधी के पर कतरने का मन बना लिया । पुलिस महकमा आग बबूला हो उठा और उन आठ जवानों की मौत ने देश को चैन से सोने नहीं दिया । 21वीं सदी में कोई अपराधी कानून को यूं भून कर आजाद घूमे और भी उस मुख्यमंत्री के राज में जो अपराधियों के सपने में काल बनकर मँडराता है, ये सत्ता के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाली बात थी । इस बार कानून सर्वोपरी था… शासक का शपथ उससे भी ऊपर । विकास दुबे की तलाशी शुरू हुई….. जिंदा या मुर्दा ।

कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे उज्जैन के महाकाल मंदिर से गिरफ्तार, कानपुर में 8 पुलिसकर्मियों की हत्या का आरोपी
Source- ANI

हफ्ते भर में विकास दुबे गैंग का एक एक हिस्सेदार पुलिस की गोलियों का शिकार हुआ । विकास को भी मालूम था, उसका भी हश्र यही होगा। वो डरा सहमा राज्य दर राज्य भागता हुआ उज्जैन के महाकाल शिव के चरण में जा पहुंचा । शायद भूल गया कि शिव भक्त तो रावण भी था, लेकिन पाप किसी भक्ति के दबाव से नहीं झुकता, सजा मिलनी तय थी । प्रायश्चित तो करना ही था, बस वो शायद मौत के डर से ज़िंदगी की भीख मांगने पहुंचा था । मध्यप्रदेश उज्जैन महाकाल मंदिर के सुरक्षा अधिकारियों ने उसे पहचाना और पुलिस को खबर की । विकास दुबे गिरफ्तार हुआ, शायद वह भी यहीं चाहता था । विकास दुबे एनकाउंटर मौत से भली उम्रक़ैद होगी, ऐसा उसका आखिरी दांव था । लेकिन योगी शिव को कुछ और ही मंजुर था । रास्ते में विकास दुबे की गाड़ी का सतुलन बिगड़ा, मौके का फाइदा उठाकर भागने की कोशिश और पुलिस द्वारा विकास दुबे एनकाउंटर में मारा गया । 8 दिन , 6 एंकाउंटर और विकास दुबे का गैंग के अंजाम को अपराध की गलियों में एक कड़वा सबक बना कर परोस दिया गया । हालांकि एंकाउंटर के विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहें हैं लेकिन विकास दुबे के मौत से किसी को हमदर्दी नहीं हैं , उसकी माँ को भी नहीं ।

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