Emergency 1975: जब संविधान के खिलाफ इंदिरा गांधी ने चलाई थी अपनी हुकुमत

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आज भारतीय इतिहास के सबसे विवादास्पद दिन के 45 साल पूरे हो चुके हैं। ‌भारतीय इतिहास का सबसे विवादास्पद दिन 25 जून 1975, Emergency यानी कि आपातकाल की घोषणा। ‌ तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को पूरे देश में आपातकाल की घोषणा की थी जो 21 मार्च 1977 तक यानी कि 21 महीने तक लागू रहा था। पूरे देश में आपातकाल घोषित करने के पीछे इंदिरा गांधी सरकार ने काफी दलीले दी थी और देश में बहुत बड़ा खतरा भी बताया था लेकिन इसकी सच्चाई कुछ और ही थी। ‌देश में Emergency तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के द्वारा जबरदस्ती थोपा गया एक ऐसा फैसला था जिसका दर्द पूरा लोकतंत्र कई पीढ़ियों तक झेलता रहा।

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इतिहास का सबसे काला दिन :-

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे सिद्धार्थ शंकर रे ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देश में आंतरिक आपातकाल करने की सलाह दी थी। इसके साथ ही संजय गांधी का इमरजेंसी में विशेष प्रभाव माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इमरजेंसी लागू करने के पीछे संजय गांधी का ही हाथ था। 25 जून 1975 की रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर आपातकाल के मसौदे पर मुहर लगाते हुए संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित कर दिया। संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्रधानमंत्री की सलाह पर वह हर छह महीने बाद 1977 तक आपातकाल की अवधि बढ़ाते रहे।

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Emergency में लगे इंदिरा गांधी पर यह आरोप:-

ऐसा बताया जाता है कि आपातकाल की तैयारी 1971 में हुए लोकसभा चुनाव से ही शुरू हो ग‌ई थे। ‌1971 लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी राजनारायण को पराजित किया था और इसी चुनाव परिणाम के 4 साल बाद राजनारायण ने चुनाव के परिणाम को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहे जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर दिया था और उन पर 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया गया था। और प्रतिद्वंदी राज नारायण सिंह को चुनाव में विजयी घोषित कर दिया था।

इंदिरा गांधी पर यह आरोप लगाए गए थे कि उन्होंने चुनाव के दौरान सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया था और तय सीमा से अधिक पैसे खर्च किए और मतदाताओं को गलत तरीके से प्रभावित किया था।

इन तमाम आरोपों के बावजूद भी इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया और अदालत के निर्णय को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई।

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लोकतंत्र की स्वतंत्रता पर लगा दी गई पाबंदी:-

आपातकाल लागू करने के बाद इंदिरा सरकार ने पूरे देश में विपक्षी पार्टियों के नेताओं को सलाखों के पीछे डालना शुरू कर दिया और तमाम मनमानियां की। ‌Emergency के पहले हफ्ते में ही संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 को निलंबित कर दिया गया, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी और गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर अदालत के सामने पेश करने के अधिकारों को रोक दिया गया।

यही नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून रासुका में भी कई बदलाव किए गए। 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से इमरजेंसी के घोषणा पत्र पर दस्तखत करा लिया गया। इसके तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई समेत सभी विपक्षी नेता गिरफ्तार कर लिए गए।

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मीडिया पर लगा दिया गया प्रतिबंध:-

आपातकाल लगते हैं मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया और अखबारों पर सेंसर बैठा दिया गया था। इसके साथ ही अखबारों और समाचार एजेंसियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने नए नए कानून भी बनाए। ‌तत्कालीन इंदिरा सरकार ने 4 समाचार एजेंसी पीटीआई, यूएनआई, हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती को खत्म करके उन्हें एक एजेंसी में विलीन कर दिया जिसका नाम ‘समाचार’ रखा गया।

अंग्रेजी दैनिक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ का प्रकाशन रोकने के लिए बिजली के तार तक काट दिए गए। इस बात का पूरा इंतजाम किया गया था कि नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना आम जनता तक ना पहुंचे और जिन पत्रकारों ने भी आवाज उठाने की कोशिश की थी, उन पत्रकारों को भी जेल में बंद कर दिया गया था। हालांकि, अखबार बाद में फिर छपने लगे, लेकिन उनमें क्या छापा जा रहा है ये पहले सरकार को बताना पड़ता था।

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जबरन चलाया गया नसबंदी अभियान :-

देश में जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए जबरदस्ती लोगों का नसबंदी कराया जाने लगा। ऐसा बताया जाता है कि 16 साल से लेकर 60 साल तक के पुरुषों का जबरन नसबंदी कराया गया था। ‌नसबंदी का फैसला इंदिरा सरकार ने जरूर लिया था लेकिन इसे लागू कराने का जिम्मा उनके छोटे बेटे संजय गांधी को दिया गया।‌

दरअसल सरकार जनसंख्या विस्फोट को रोकना चाहती थी और सरकार यह समझ चुकी थी कि, जब तक जनसंख्या नियंत्रित नहीं होती है सरकार सभी का पेट नहीं भर सकती।‌ परिवार नियोजन के अन्य फॉर्मूले फेल साबित होने पर आपातकाल ने नसबंदी को लागू करने के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया। एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ एक साल के भीतर देशभर में 60 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर दी गई थी।

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जिसने भी किया विरोध उसे जेल में बंद कर दिया :-

इंदिरा गांधी के द्वारा लागू किए गए Emergency के फैसले का जिसने भी विरोध किया था उसे जेल में बंद कर दिया जाता था। ‌21 महीने में 11 लाख लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। विपक्षी दलों के सभी बड़े नेताओं मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडीज, जयप्रकाश नारायण और चन्द्रशेखर को भी जेल भेज दिया गया, जो इन्दिरा कांग्रेस की कार्यकारिणी के निर्वाचित सदस्य थे।

Emergency लागू करने वाली रात को आकाशवाणी में एक समाचार बुलेटिन प्रसारित किया गया जिसमें आंतरिक अनियंत्रित स्थितियों का हवाला देते हुए पूरे देश में इमरजेंसी लागू किए जाने की सूचना दी गई। ‌आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी।

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इमरजेंसी के पीछे संजय गांधी का था दिमाग :-

ऐसा बताया जाता है कि इमरजेंसी भले ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लागू किया था मगर इसके पीछे की सोच उनके छोटे बेटे संजय गांधी की थी। एक ओर देश में ऐसी तानाशाही थी तो वहीं इंदिरा के बेटे संजय गांधी ने देश को आगे बढ़ाने के नाम पर पांच सूत्रीय एजेंडा बनाया था जिसमें  वयस्क शिक्षा, दहेज प्रथा का खात्मा, पेड़ लगाना, परिवार नियोजन और जाति प्रथा उन्मूलन शामिल था।

यही नहीं दिल्ली के सुंदरीकरण के नाम पर अल्पसंख्यकों का काफी उत्पीड़न किया गया। दिल्ली में सैकड़ों घरों को बुलडोजरों की मदद से जबरन तोड़कर वहां रह रहे लोगों को शहर से 15-20 किलोमीटर दूर पटक दिया। उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर, सुल्तानपुर और सहारनपुर, हरियाणा में पीपली के अलावा दूसरे स्थानों पर इसके लिए लाठियां और गोलियां भी चलाई गई।

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क्या हुआ था आपातकाल का असर:-

• देश में आपातकाल लगाए जाने के बाद जनता से जनता के सभी मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे जो कि लोकतंत्र और संविधान भारत की जनता को देता है। ‌

• पहले तो सभी मीडिया और समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था लेकिन जब समाचार पत्रों को छापने की इजाजत दी गई तब उन्हें विवश किया गया कि वह प्रकाशन से पूर्व सभी सूचनाएं सेंसर बोर्ड को दिखाएं और सेंसर से गुजरने के बाद ही उसे प्रकाशित करें।

• देश में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन जनता के बीच काफी लोकप्रिय हो रहा था और कांग्रेस की सरकार अपने कुशासन के कारण काफी अप्रिय हो चुकी थी जिसके कारण इंदिरा गांधी पर सत्ता छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा था। ‌तब इंदिरा गांधी सरकार ने इस जनमानस को दबाने के लिए तानाशाही का रास्ता चुना।

• 25 जून, 1975 को दिल्ली में हुई विराट रैली में जय प्रकाश नारायण ने पुलिस और सेना के जवानों से आग्रह किया कि शासकों के असंवैधानिक आदेश न मानें। तब जेपी को गिरफ्तार कर लिया गया।

• आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी विरोधी दलों के नेताओं को गिरफ्तार करवाकर अज्ञात स्थानों पर रखा गया। सरकार ने मीसा (मैंटीनेन्स ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट) के तहत कदम उठाया।

• सरकार ने कोर्ट में किसी को बेल नहीं देने का भी प्रावधान कर रखा था। आपातकाल के दौरान कोई अपनी बात भी नहीं रख सकता था इतनी तानाशाही देश में लागू कर दी गई थी।

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1977 में मोरारजी देसाई की सरकार ने हटाया Emergency:-

Emergency के चलते जनता में कांग्रेस के प्रति अविश्वास चरम पर पहुंच गया था। जनता में कांग्रेस पार्टी के प्रति काफी आक्रोश भर चुका था। मगर तभी इंदिरा गांधी सरकार ने चुनाव कराने की घोषणा की इंदिरा गांधी सरकार को लगा था कि सबकुछ उनके पक्ष में होगा लेकिन इसके उलट परिणाम निकला। चुनाव कराए गए और आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस को 1977 में हुए चुनाव में करारी शिकस्त मिली और कांग्रेस को सिर्फ 154 सीटें मिली। ‌

21 मार्च 1977 में जब मोरारजी देसाई की सरकार आई, तो फिर संविधान में संशोधन करके वह सभी अधिकार वापस दिलाए गए जिन्हें इंदिरा गांधी सरकार ने Emergency में छीन लिया था। ‌इसके बाद आपातकाल के प्रावधान में संशोधन करके ‘आंतरिक अशांति’ के साथ ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द भी जोड़ दिया गया ताकि फिर कभी भविष्य में कोई सरकार इसका दुरुपयोग न कर सके।

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