अयोध्या के रौनक में खटकती मिथिला की त्रासदी

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बिहार में बाढ़ का कहर इस कदर है कि कोरोना जैसी वैश्विक महामारी भी अब लोगों को कम लगने लगी है । कहीं पल टूट रहा है, कहीं नाव पलट रहें है । देश मे राम मंदिर भूमिपूजन की धूम है लेकिन इस बीच सीता मईया का गांव बाढ़ की चपेट में है ये कैसे भुला जा सकता है । मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज राहत कार्यों का जायजा लेने हवाई सर्वेक्षण पर निकले है । सवाल यही है कि तकरीबन दो हफ्ते के बाद हवाई सर्वेक्षण और हवाई वादें, जमीनी हक़ीकत में कुछ परिवर्तन ला पाएंगे ?

वर्षों का विवाद आज खत्म हुआ, भूमिपूजन के साथ राम मंदिर निर्माण प्रक्रिया शुरू हुई । हर्षोल्लास और नारो नगारो के बीच सजी धजी अयोध्या नगरी… ये दृश्य आंखों में बसा लीजिये । भगवान राम को याद कीजिये । जरा देखिये, सीता माता नजर आ रही है क्या ? सोशल मीडिया पर आज प्रभु राम अकेले तो ट्रेंड नहीं कर रहें । क्योंकि अयोध्या के राम का जिक्र आया । पटना के हनुमान मंदिर का जिक्र आया… लेकिन मिथिला के सीता माता का जिक्र नहीं आया । मिथिला… बाया नदी के आस पास का क्षेत्र… आज का दरभंगा…. बाढ़ में डूबा हुआ है । नेपाल से आने वाली नदियों ने दरभंगा मिथिला समेत पूरे उत्तर बिहार को डुबो दिया है । राम के रौशन नगरी के साथ माता सीता की डूबी धरती को कैसे एक साथ देखा जाए ?

बिहार सदियों से बाढ़ का साक्षी रहा है । ये इतिहास है…लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण है कि ये अपने आप मे एक सवाल है कि बिहार सदियों से बाढ़ का साक्षी क्यों रहा है । 70 सालों में हर साल आने वाली बाढ़ का कोई निदान क्यों नहीं निकला, ये एक सवाल है । 70 साल में भी डूबे बिहार के सीमा पर मौजूद बांध या तटबंध इतने कमजोर कैसे रहें, ये भी एक सवाल है और 70 साल के बाद आज भी विकास के योजनाओं का इस बहाव में बह जाना क्यों मुमकिन हो पाया ये भी एक सवाल है । सवाल कई है , जवाब देना शासन की जिम्मेदारी है, हमारा काम उस सवाल की भयावहता को दिखाना है, आइए देखते है ।

खगड़िया में 40 लोगों से लदी नाव नदी में पलट गई । लाशें लापता है, तलाश जारी है, खबर लिखे जाने तक 10 शवों का मिलना भी मुमकिन हो पाया है । तिरहुत तटबंध का पूर्वी हिस्सा टूट चुका है ।बिहार का पाते पुर, सारण समेत वो वैशाली भी जलमग्न है जहां अमूमन जलस्तर नहीं पहुंचता है । कितने डूब कर मरे और कितने महामारी से इसका कोई हिसाब तो नहीं है लेकिन फिर भी सरकारी आकड़े बताते है कि अब तक बाढ़ इसे 13 लोगों की जान जा चुकी है ।  पूर्वी चंपारण बाढ़ के सबसे ज्यादा चपेट में है और NGO और रेडक्रोस के कम्युनिटी किचेन की बदौलत जी रहा है । सरकारी सुविधाएं हेलीकाप्टर से पहुंची है लेकिन जमीन पर आते आते तितर बितर हो गयी । हालात दिल दहलाने वाले है । कोरोना के डर से अपनी जान अपना घर बचाने आये मजदूरों ने बाढ़ में अपना सबकुछ खो दिया है । नाउम्मीद आंखें सरकार की तरफ देख रही है । उन्हें दो वक्त की रोटी चहिए, रहने को कहीं छत चाहिये और उसके बाद जब सब ठीक हो जाये कुछ हद तक तो इस बाढ़ का कोई ठोस निदान चाहिए । फिलहाल तो बस रोटी और रोजगार…. इतना ही…

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